खड़े होकर नहीं बैठ कर खाइये खाना

अगर आप किसी बड़े शहर में रहते हैं तो ऐसे दृश्य आपने जरूर देखे होंगे जिनमें लोग सड़क पर गाड़ी में चलते हुए नाश्ता या खाना खा रहे होते हैं। दिल्ली में तो प्राय: ऐसे दृश्य दिखायी दे जाते हैं। लाल सिग्नल पर गाड़ी रूकती है, लोग अपना लंच बॉक्स खोलते हैं और खाना शुरू कर देते हैं। हरा सिग्नल होते ही डिब्बा बंद करके बगल की सीट पर रख देते हैं। अगले लाल सिग्नल पर फिर यही प्रक्रिया दोहरायी जाती है। घर से लेकर ऑफिस पहुंचने तक बहुत से लोगों की जिन्दगी का एक हिस्सा बन गया है सड़क पर ड्राइव करते हुए खाना या नाश्ता करना। बहुत सारे बड़े – बड़े लोग, मल्टीनेशनल कंपनियों में कार्य करने वाला युवा वर्ग यहाँ तक कि कामकाजी महिलाएँ भी इस आदत की शिकार हैं या यूँ कहिए यह उनके जीवन का एक हिस्सा बनता जा रहा है और शायद ‘स्टेटस सिंबल’ भी ।  

             जरा सोचिए आप कितने भी व्यस्त क्यों न हो सुकून से खाना खाने का समय तो निकाल ही सकते हैं। अगर आप सुकून से खाना भी नहीं खा सकते तो इतनी पद, प्रतिष्ठा, धन – दौलत, और भागदौड़ किस काम की। सारी मेहनत सारा परिश्रम इसीलिए तो है कि आदमी चैन से दो रोटी खा सके। पर देखिए क्या समय आ गया है अब हमें सड़क पर चलते हुए खाना खाना पड़ रहा है।

           मुझे याद हैं अपने पुराने दिन जब हम गाँव में रहते थे। चौके में खाना बनता था। गरम -गरम रोटी और दाल। दादी के सामने पीढ़ा बिछाकर हम बैठते थे और चूल्हे पर बनी दाल और फूली हुई रोटी सीधी थाली में परोसी जाती थी। खाने से पहले हाथ पैर धोना, पीढ़े पर पालथी मारकर बैठना और भोजन शुरू करने से पहले आंखें बंद करके मंत्र पढ़ना उस समय के जरूरी नियम थे जिनका पालन सभी लोग करते थे ।

         तब से लेकर आज तक हमने कितनी प्रगति कर ली है। जमीन पर पालथी मारकर बैठने से लेकर हम डाइनिंग टेबल तक आ पहुंचे थे और अब उससे भी आगे यानी खड़े – खड़े और चलते – फिरते खाना खाने का ट्रेंड शुरू हो गया है । सचमुच तरक्की ही तो है। यह बात अलग है कि इस तरक्की की हम भरपूर कीमत चुका रहे हैं अपने बिगड़ते स्वास्थ्य के रूप में, या फिर तनाव और चिड़चिड़ाहट के रूप में, या फिर कई नये – नये रोग लक्षणों के रूप में जिनका इलाज कहीं नहीं है क्योंकि ये समस्याएँ हमारी बिगड़ी हुई आदतों की वजह से हैं । कभी ये दवा, तो कभी ये टॉनिक, कभी ये पुड़िया तो कभी ये गोली; बहुत इलाज करते हैं पर बीमारी जाती नहीं और स्वास्थ्य वापस आता नहीं। बस यही कहानी बार – बार दोहरायी जाती है ।

          बड़े शहरों में आपको ऐसे बहुत से होटल और रेस्टोरेंट मिल जाएंगे जहाँ पर केवल टेबल की व्यवस्था है बैठने के लिए कुर्सियों की नहीं क्योंकि वहाँ पर खड़े – खड़े खाने का ही सिस्टम है। पर जरा सोचिए क्या स्वास्थ्य की दृष्टि से यह उचित है? कहीं तरक्की की आड़ में या अपने आपको ज्यादा सभ्य और सुसंस्कृत दिखाने की होड़ में हम अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे हैं । ऐसे रेस्टोरेंट में आपको युवा पीढ़ी के अनेक लोग मिल जाएंगे जो फास्ट फूड और जंक फूड की प्लेट के साथ कोल्ड ड्रिंक की बोतल लेकर खड़े – खड़े खाते हुए ऐसा प्रदर्शित करते हैं जैसे उन्होंने कोई विशेष लक्ष्य हासिल कर लिया हो । साथ में सेलफोन और व्हाट्सएप पर तेजी से चलती उंगलियाँ ………..। कई बार उन्हें देख कर लगता है कि ये सब शायद किसी और ग्रह के प्राणी हैं और यहाँ पृथ्वी पर गलती से या मजबूरी में आ गए हैं।

                बैठकर भोजन करने के अनेक लाभ सर्वविदित हैं । प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत आहार चिकित्सा में हमेशा इस बात पर जोर दिया जाता है कि हम बैठकर शांत चित्त से खाना खाएँ। खाना खूब चबा – चबाकर खाएँ । खाना खाते समय खाने पर ही ध्यान केंद्रित करें। खाते समय टी.वी., समाचारपत्र, सेलफोन, लैपटॉप का प्रयोग न करें। खाना खाने के साथ पानी न पिएँ आदि …. आदि। बहुत से लोग इसे गंभीरता से लेते हैं और बहुत से हवा में उड़ा देते हैं क्योंकि उनके पास टाइम ही कहाँ है जिन्दगी में इतने नियम कायदे से चलने का। अभी तो मौज मस्ती की जिन्दगी है थोड़ा सा तो चैन से जी लें । पर इस मौज मस्ती के चक्कर में हम अपनी आदतें, अपना खानपान और अपनी जीवनशैली बिगाड़ कर धीरे – धीरे अपना स्वास्थ्य खोने के कगार पर आ जाते हैं।  

             प्राकृतिक चिकित्सा में दिए गए इन सुझावों को अब अनुसंधान ने भी सही साबित किया है। हिंदुस्तान, नई दिल्ली में दिनांक 24.06.2019 को प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार बड़े – बुजुर्ग लोग हमेशा जमीन पर बैठकर खाना खाने की सलाह देते हैं क्योंकि इसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं । खाना सही से पच जाता है, मांसपेशियाँ सक्रिय रहती हैं और रक्त का संचार सही चलता है। साथ ही अध्ययन में यह भी पता चला है कि जमीन पर बैठकर खाने से खाने का स्वाद बेहतर हो जाता है जबकि खड़े होकर खाना खाने से शारीरिक तनाव बढ़ता है और खाने का स्वाद कम हो जाता है।

              शोधकर्त्ताओं का यह भी कहना है कि बैठने की मुद्रा से खाने का स्वाद प्रभावित होता है। ‘जरनल ऑफ कंज्यूमर रिसर्च’ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, अगर आप कुछ मिनटों के लिए भी खड़े होकर खाना खाते हैं तो इससे शारीरिक तनाव बढ़ जाता है जब कि बैठने की मुद्रा खाने के स्वाद को प्रभावित करती है। शोधकर्त्ताओं ने विशेषतौर पर यह देखा कि वेस्टिबुलर सेंस (जो शरीर में संतुलन का काम करती है) किस तरह स्वाद संवेदी प्रणाली (जो स्वाद को प्रभावित करती है) से संबंधित होती है। यूएस में साउथ फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर दिपायन विश्वास का कहना है कि गुरुत्वाकर्षण बल तेजी से शरीर के निचले हिस्से में रक्त को ढकेलता है। इसकी वजह से ह्रदय को शरीर के ऊपरी हिस्से तक रक्त को वापस लाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। जिससे हृदयगति बढ़ जाती है। यह हाइपोथैलेमिक पिट्यूटरी एड्रिनल एक्सिस को सक्रिय करता है और तनाव हार्मोन का कोर्टीसोल को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। इसके बढ़ने से संवेदी संवेदनशीलता कम हो जाती है।

                 इतना ही नहीं शोधकर्त्ताओं ने भोजन के स्वाद और खड़े होकर खाने के बीच संबंध जानने के लिए एक अध्ययन किया जिसमें 350 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इसमें खड़े होकर और बैठकर खाना खाने वाले सभी लोगों को एक ही तरह का खाना परोसा गया। इसके बाद उनके अनुभवों से पता चला कि खड़े होकर खाना खाने वाले लोगों का तनाव हार्मोन का स्तर बढ़ गया था और स्वादिष्ट खाना भी उनको बेकार लगा। वहीं जो लोग बैठकर खाना खा रहे थे उनको खाने का स्वाद बेहतरीन लगा।  

              तो अब निर्णय आपके हाथ में है। चलते, फिरते या खड़े- खड़े खाना है या फिर आराम से जमीन पर पालथी मारकर बैठकर भोजन करना है। एक तरफ स्वास्थ्य है, संतुलित जीवनशैली है, अच्छी आदतें हैं और सबसे बढ़कर मन का सुकून है; वहीं दूसरी ओर बीमारी, हड़बड़ी, बिगड़ती हुई जीवनशैली और उसे अधिक बिगाड़ने वाली आदतें हैं। अच्छा तो यही होगा कि हम अपने समय का सही प्रबंधन करें। नाश्ते और भोजन के लिए पर्याप्त समय निकालें। सुकून से भोजन करें तथा भोजन का आनंद लें। यकीन मानिए जितना हमारा भोजन प्राकृतिक और कम मिर्च मसाले वाला होगा और जितना हम उसे चबाकर खाएंगे उतना ही ज्यादा हमें वह स्वादपूर्ण लगेगा और उतना ही अधिक हमें आनन्द आएगा।

              इसलिए स्वस्थ रहना है तो आज से ही आदत डालिए जमीन पर बैठकर भोजन करने की; भूख से थोड़ा कम भोजन करने की; खूब चबा-चबा कर भोजन करने की; प्राकृतिक और सादा भोजन करने की; रात के भोजन और सोने के बीच तीन घंटे का अंतर रखने की; भोजन के साथ पानी न पीने की; बार – बार भोजन न करने की; खाने के बाद थोड़ी देर वज्रासन में बैठने की; सप्ताह में एक बार फलाहार या उपवास करने की; सकारात्मक सोचने की; प्रकृति के नजदीक रहने की; पर्याप्त विश्राम करने की; रोजाना योगाभ्यास और प्राणायाम करने की; क्योंकि स्वास्थ्य है तो सब कुछ है और स्वास्थ्य नहीं तो कुछ भी नहीं।

(निसर्गोपचार वार्ता, अगस्त, 2019 में प्रकाशित)

____________

4 thoughts on “खड़े होकर नहीं बैठ कर खाइये खाना

Leave a reply to stuti Cancel reply

Design a site like this with WordPress.com
Get started