कम खाना और खूब चबाना

अगर आप किसी से पूछें कि उनको सामान्य रूप से खाना खाने में कितना समय लगता है तो उत्तर देने से पहले उनको थोड़ा सोचना पड़ेगा I इस प्रश्न का उत्तर अलग – अलग लोगों के लिए अलग – अलग हो सकता है I पर एक औसत उत्तर जो लोगों से मिलता है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि एक औसत समय जो हम खाना खाने में लगाते हैं वह पाँच से सात मिनट का होता है I हाँ कुछ ऐसे भी लोग आपको मिलेंगे जो तीन से पाँच मिनट में ही खाना खाकर हाथ भी धो लेते हैं I वहीं अपवाद के तौर पर खाने में दस से पंद्रह मिनट तक लगाने वाले लोग भी मिल जाएंगे पर बहुसंख्य लोग जल्दी – जल्दी खाने वाले ही मिलेंगे I


दरअसल खाना खाने में लगने वाले समय का कोई स्टैंडर्ड फार्मूला नहीं है I पर एक मोटी बात जो समझने वाली है वह यह है कि खाना धीरे – धीरे खूब चबाकर खाना चाहिए, आराम से खाना चाहिए, शांतिपूर्वक बैठकर खाना चाहिए, तनाव रहित होकर प्रसन्न मुद्रा में खाना चाहिए, हाथ, पैर, मुंह धोकर खाना चाहिए, जब भूख लगे तब खाना चाहिए, स्वाद लेकर खाना चाहिए, खाना खाते समय खाने पर ही ध्यान होना चाहिए ….. आदि…आदि I इन सब बातों को हम ‘माइंडफुल ईटिंग’ के तौर पर समझ सकते हैं I ‘माइंडफुल ईटिंग’ माने ध्यान से खाना और जो खा रहे हैं उस पर ध्यान लगाना I


अब जरा अपने बचपन को याद करिए I आपके घर में दादी, नानी या अन्य बुजुर्ग महिलाएं आपको हमेशा इन बातों के लिए टोकती थीं I बिना हाथ, पैर धोए हुए आप रसोई में नहीं जा सकते थे I थाली में परोसा हुआ गरम खाना, बढ़ती हुई भूख और उनकी हिदायतें कि धीरे – धीरे खाओ, खाना कहीं भागा नहीं जा रहा है…. आपको अभी भी याद होंगी I हाँ उन दिनों आजकल की तरह बहुत सारे इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स जैसे – सेलफोन, कम्प्यूटर, लैपटॉप, टी. वी. आदि नहीं थे और न ही समय को ‘किल’ करने वाले और ध्यान भटकाने वाले सोशल मीडिया के साधन जैसे – व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक आदि इसलिए सारा ध्यान खाने पर ही केन्द्रित रहता था I खाना खाकर आपको स्कूल जाना होता था या फिर पढ़ाई करनी होती थी इसलिए कोई हड़बड़ी भी नहीं थी I कहने का अर्थ यही है कि तब हम आराम से शांतिपूर्वक पर्याप्त समय देते हुए जो कुछ भी भोजन है उसे खाकर तृप्त हो जाते थे I


पर आज की स्थिति इसके बिलकुल विपरीत है I आज हमारे पास भांति – भांति के संसाधन हैं I अच्छा भोजन है I बढ़िया घर है I सोफा और डाइनिंग टेबिल है I कीमती क्राकरी है I किचेन के सारे एपलायनसेज़ – जूसर, मिक्सर, ग्राइंडर, टोस्टर, ओवन, इंडक्शन स्टोव, कुकिंग रेंज हैं पर …… भोजन करने के लिए समय नहीं है I हम सुबह का नाश्ता दोपहर को तथा दोपहर का भोजन शाम को करते हैं I और रात का भोजन रात को कितने बजे करते हैं यह हमें भी याद नहीं रहता I इस सारे उलटफेर में भूख न जाने कहाँ गायब हो जाती है बस खाने का समय ही मुश्किल से याद रह पाता है I इतने बजे ब्रेकफास्ट और इतने बजे लंच……. I फिर चाहें भूख हो या न हो I हम डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाने की औपचारिकता पूरी कर लेते हैं I उस पर भी साथ में सेलफोन, कम्प्यूटर, लैपटॉप, टी.वी. तो चल ही रहे होते हैं I फोन पर व्हाट्सएप मैसेज चेक करना हो या ईमेल…. अक्सर सारी चीजें हमें खाने के समय ही याद आती हैं I टी.वी. पर खबरें और मारधाड़ वाले सीरियल भी हम प्रायः खाने के समय ही देखना पसंद करते हैं भले ही उसकी वजह से हम जरूरत से ज्यादा खा लें I


कई बार तो स्थिति और भी बिगड़ जाती है जब खाने की टेबल पर जंक फूड और फास्ट फूड का कब्जा हो जाता है I टी.वी. ने एक नई फटाफट संस्कृति को जन्म दे दिया है और हम बिना सोचे – विचारे उसका अंधानुकरण करते चले जा रहे हैं I एक मिनट में बनने वाले नूडल के विज्ञापन ने हमारे मस्तिष्क को इस तरह प्रभावित कर दिया है कि हम उसे एक मिनट में ही खाकर खत्म भी कर देते हैं I ऐसे में भोजन में पोषक तत्त्व और गुणवत्ता की बात करना पिछड़ेपन की निशानी समझा जाने लगा है I


आखिर खाना खाने में इस हड़बड़ी का कारण क्या है? अगर किसी से आप पूछ बैठें तो इसका कोई संतोषजनक उत्तर उनके पास नहीं है सिवाय यह कहने के कि ‘क्या करें भई….समय नहीं है’ I आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस भोजन को जुटाने के लिए हम लगातार अथक परिश्रम करते हैं उसी को शांतिपूर्वक बैठकर ग्रहण करने के लिए हमारे पास समय नहीं है I पर बात केवल भोजन की ही नहीं है I हमारे पास किसी भी कार्य को तसल्ली से करने का समय नहीं है I हर काम हम जल्दी – जल्दी करते हैं या करना चाहते हैं I फिर चाहें वह सांस लेना हो या कुछ और I और इस जल्दी का दुष्परिणाम शीघ्र ही रोग के रूप में हमारे सामने आ जाता है I


अक्सर लोगों को भोजन के बारे में नियम – कायदों का पालन करने की तथा पथ्य – अपथ्य की सलाह चिकित्सक द्वारा दी जाती है I एक दो दिन तो उस पर गंभीरता से अमल करने का प्रयास किया जाता है पर बाद में वह सलाह दिमाग में जमा अनावश्यक सूचनाओं के अथाह समुद्र में कहीं खो जाती है और खाने के बारे में हमारा वही पुराना रवैया शुरू हो जाता है I


दरअसल हम अपने शरीर के प्रति संवेदनशील नहीं हैं I सही या गलत कुछ भी पेट में डाल देने को ही भोजन समझने लगते हैं I पेट को शायद हमने ‘कूड़े का डिब्बा’ समझ लिया है जिसमें कभी भी कुछ भी डाल दिया I पर वास्तव में ऐसा नहीं होना चाहिए I भोजन को पोषक, सात्विक, यथासंभव प्राकृतिक, आसानी से पचने योग्य, सीमित तथा मौसम के अनुकूल होना चाहिए I अक्सर हम मिर्च – मसाले डालकर और तल – भूनकर उसे स्वादिष्ट और चटपटा बनाने का प्रयास करते हैं फलस्वरूप वह जरूरत से ज्यादा खा लिया जाता है I जिसका परिणाम यह होता है कि हम पाचन संस्थान के बहुत सारे रोगों का शिकार होने लगते हैं I हमें याद रखना चाहिए कि स्वस्थ रहने का एक सीधा सा फार्मूला है ‘कम खाना और खूब चबाना’ I मतलब आहार सीमित हो और उसे खूब चबाकर खाया जाए I पाचन संस्थान की बहुत सारी समस्याओं का समाधान इसी एक सिद्धान्त को अपनाने से हो सकता है I


इस सिद्धान्त को अपनाना बहुत आसान है I पहला नियम तो यह है कि खाने की मात्रा सीमित हो I आवश्यकता से अधिक भोजन हमेशा समस्याओं को जन्म देता है I प्रायः मोटापा जैसे रोगों का एक कारण आवश्यकता से अधिक भोजन करना, जल्दी – जल्दी बिना ठीक से चबाये हुए भोजन करना, बार – बार भोजन करना, तथा अधिक तला – भुना भोजन करना भी है I इसलिए खाने की मात्रा परिमित ही होनी चाहिए I शांत अवस्था में बैठकर भोजन पर ध्यान केन्द्रित रखना तथा समय से भोजन करना सबसे अधिक आवश्यक है I ये सारे नियम – कायदे हम जानते भी हैं पर आश्चर्य की बात है कि जीभ के क्षणिक स्वाद के कारण इन नियमों को अनदेखा कर देते हैं I


दूसरा नियम यह है कि खाने को खूब चबाकर खाया जाए I अर्थात उसे तब तक चबाया जाए जब तक कि उसके छोटे – छोटे टुकड़े होकर तथा उसमें लार मिलकर उसका पेस्ट जैसा न बन जाए I अगर आप अपने भोजन को 32 बार चबाएँ तो भोजन बिलकुल तरल हो जाता है I यह एक आदर्श स्थिति कही जा सकती है I यदि हम अपने भोजन को खूब अच्छी तरह से चबाएंगे तो पेट के रोगों के होने की संभावना न्यूनतम हो जाएगी I


इसलिए निष्कर्ष यही निकलता है कि स्वस्थ रहना बहुत आसान है यदि हम स्वास्थ्य के इस साधारण नियम ‘कम खाना और खूब चबाना, तंदुरुस्ती का यही खज़ाना’ का निष्ठापूर्वक पालन करें और उसे अपनी आदत बना लें I इस एक आदत को अपनाकर न केवल हम बहुत सारे रोगों का शिकार होने से बच सकेंगे बल्कि एक स्वस्थ और प्रसन्नता भरा जीवन बिताने में भी समर्थ हो सकेंगे I हमें याद रखना चाहिए कि अच्छी और सुरुचिपूर्ण आदतें ही हमारे जीवन को गुणवत्तापूर्ण बनाती हैं I


भोजन के इस नियम का पालन करने के साथ – साथ दिनचर्या में व्यायाम, योगाभ्यास, प्रकृति के पंचमहाभूतों के साथ अधिकाधिक समन्वय, पर्याप्त विश्राम और निद्रा का भी आवश्यक स्थान है I इसलिए इनको भी उचित रूप से अपने जीवन का अंग बनाना चाहिए I तली – भुनी चीज़ें, मैदा से बनी चीज़ें, चीनी और नमक का अधिक प्रयोग, फटाफट खाद्य पदार्थ (फास्ट फूड), जंक फूड, बाजार के ठंडे पेय, आइसक्रीम, मांसाहार, तथा तनाव से दूरी बनाकर रखना सबसे अच्छा है I इनके स्थान पर मौसमी फलों और सब्जियों, अंकुरित अन्न, सलाद, फलों के रस, सब्जियों का सूप आदि के प्रयोग से शरीर सक्रिय और हल्का बना रहेगा जिसकी आज के समय में सर्वाधिक आवश्यकता है I योग और प्राणायाम के अभ्यास के साथ – साथ स्वच्छ वायु और धूप का सेवन, सकारात्मक मानसिकता तथा प्रातः भ्रमण आपकी जीवनी शक्ति को बढ़ाएँगे और आप सही अर्थों में एक स्वस्थ और रोग रहित जीवन बिता सकेंगे I


(आरोग्य, मई, 2021 में प्रकाशित)
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